Top 10 Places in Mathura to Visit
1.श्री कृष्ण जन्मभूमि
श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा के मध्य में स्थित एक बहुत ही पवित्र जगह है कहा जाता है कि यहीं पर भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था इस स्थान का इतिहास हजारों साल पुराना है पहले के समय में जब भारत में कई छोटे-छोटे राजा राज करते थे तभी यहां एक छोटा मंदिर बनाया गया था बाद में गुप्त राजवंश के समय इस मंदिर को बड़ा और सुंदर बनाया गया लेकिन समय-समय पर इस पर आक्रमण हुए दसवीं सदी में महमूद गजनवी ने इसे तोड़ दिया फिर 16वीं सदी में औरंगजेब ने भी इसे खत्म करवा दिया था और यहां एक मस्जिद बनवा दी 19वीं सदी के अंत में कुछ भक्तों ने फिर से इस जगह को पुनः स्थापित करने का संकल्प लिया 1951 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने इस काम को आगे बढ़ाया और 1982 में आज का बड़ा मंदिर बनकर तैयार हुआ इस मंदिर का जो दर्शन समय है गर्मी में यह मंदिर सुबह 5:00 बजे खुलता है और दोपहर 12:00 बजे तक खुला रहता है फिर शाम 4:00 बजे से रात 9:30 बजे तक फिर खुलता है और सर्दियों में इस मंदिर के खुलने का समय थोड़ा देर हो जाता है सुबह 5:30 से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 3:00 बजे से रात 8:30 तक यदि आप श्री कृष्ण जन्म भूमि आना चाहते हैं तो आप यहां आ सकते हैं संक्षेप में कहा जाए तो श्री कृष्ण जन्म एक ऐसा स्थान है जहां इतिहास की गहरी कहानी और आज की भक्ति एक साथ मिलती है यहां आने वाले हर यात्री को शांति और खुशी की अनुभूति होती है

2. द्वारकाधीश मंदिर
द्वारकाधीश मंदिर मथुरा के केंद्र में स्थित भगवान कृष्ण के द्वारका राजा रूप का प्रमुख पूजा स्थल है इस मंदिर का इतिहास कई शताब्दियों तक फैला हुआ है कहा जाता है की मूल मंदिर का निर्माण पांचवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था जब गुप्त वंश ने इस स्थान को शिल्प कला की अद्भुत नमूना बनाने का आदेश दिया समय के साथ कई बार इस मंदिर को आक्रमण और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा 16वीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था परंतु 19वीं साड़ी के अंत में राजा सवाई जय सिंह ने इसे पुनः स्थापित किया और आज का भव्य स्वरूप तैयार किया मंदिर का मुख्य शिखर लगभग 70 फीट ऊंचा है और इसे लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है शिखर पर नक्काशी में कृष्ण के लंदन रावण के साथ युद्ध गोवर्धन धारण जैसी घटनाओं को दर्शाया गया है गर्भ ग्रह में स्थापित द्वारकाधीश की मूर्ति श्यामलाल रंजन ने बनाई है जो शुद्ध चांदी की परत से ढकी हुई है मंदिर परिसर में कई छोटे-छोटे शिकार घाट और एक बड़ा जाल से भी है जहां श्रद्धालु स्नान करके पवित्रता प्राप्त करते हैं दर्शन के समय की बात करें तो गर्मियों में मंदिर सुबह 5:00 बजे खुलता है और दोपहर 12:00 तक खुला रहता है सर्दियों में खुलने का समय थोड़ा देर से होता है सुबह 5:30 से दोपहर 12:00 तक और शाम 3:00 से रात 8:30 बजे तक विशेष अवसरों जैसे जन्माष्टमी होली और दीपावली पर विशेष आरती और कीर्तन होते हैं जिनमें बड़ी संख्या में भक्ति भाग लेते हैं मंदिर में प्रवेश मुक्त है परंतु दान की व्यवस्था उपलब्ध है मोबाइल और कैमरा अंदर ले जाना प्रतिबंधित है इसलिए श्रद्धालु केवल अपनी आंखों से ही इस पवित्र दृश्य को देख पाते हैं द्वारकाधीश मंदिर न केवल एक धार्मिक केंद्र है बल्कि भारतीय कला संस्कृति और इतिहास का भी एक जीवंत प्रतीक है यहां आने वाला हर यात्री अपने भीतर शांति और आनंद का अनुभव करता है

3. विश्राम घाट
विश्राम घाट मथुरा में यमुना के किनारे स्थित एक प्राचीन तीर्थ स्थल है कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपने बाल्य काल में यहां विश्राम किया था इसलिए इसे विश्राम घाट कहा जाता है इस घाट का इतिहास हजारों साल पुराना है और यहां यमुना के पवित्र स्थल से जुड़ी कई कहानियों का गवाह रहा है पुराने समय में इस स्थान पर केवल एक छोटा जलाशय था जहां स्थानीय लोग स्नान करके अपनी दिनचर्या शुरू करते थे कालांतर में गुप्त वंश के शासको ने यहां एक पत्र का घाट बनवाया जिससे यात्रियों को आराम करने और धार्मिक अनुष्ठान करने में सुविधा मिली मुगल काल में इस घाट को कई बार पुनर्निर्माण किया गया परंतु मूल भावना वही रही शांति और शुद्धि का प्रतीक विश्राम घाट का मुख्य आकर्षण यमुना की ठंडी जलधारा है जहां सुबह के समय सूर्य की पहली किरण पानी पर पड़ती है और एक सुंदर दृश्य बनती है घाट के किनारे कई छोटे-छोटे मंदिर और शिल्प कला के नमूने देखे जा सकते हैं जिम कृष्ण के बाल रूप की मूर्तियां विशेष रूप से लोकप्रिय हैं गर्मियों में घाट सुबह 5:00 बजे खुलता है और दोपहर 12:00 बजे तक खुला रहता है फिर शाम 5:00 बजे से रात 9:00 बजे तक फिर से खुलता है सर्दियों में इस घाट के खुलने का समय थोड़ा देर से होता है जो सुबह 5:30 से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 3:00 से रात 8:00 बजे तक रहता है विशेष अवसरों पर जन्माष्टमी दीपावली और कार्तिक पूर्णिमा पर यहां विशेष आरती और कीर्तन होते हैं इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं घाट पर स्नान करने से मन शुद्ध होता है और कई लोग यहां अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान भी करते हैं विश्रमघाट न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि मथुरा की सांस्कृतिक और इतिहास की जीवंत प्रत्येक भी है यहां आने वाले प्रत्येक यात्री को यमुना के शीतल जल में डुबकी लगाने से एक अनोखी शांति का अनुभव होता है

4. कुसुम सरोवर
कुसुम सरोवर मथुरा के वृंदावन के पास एक सुंदर जलाशय है जिसे प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना जाता है यह स्थान राधा कृष्ण की लीला से जुड़ा हुआ है और हर साल हजारों यात्रियों को आकर्षित करता है ऐतिहासिक रूप से कुसुम सरोवर का उल्लेख प्राचीन ग्रंथो में मिलता है जहां इसे कुसुम कहा गया है माना जाता है कि इसका निर्माण द्वापर युग में हुआ जब कृष्ण ने अपनी बांसुरी से सभी जीवो को आकर्षित किया समय के साथ कई राजाओं ने इसे पुनर्निर्माण किया 16वीं शताब्दी में राजा मानसिंह ने पत्थर के घाट और चबूतरे बनवाए जबकि 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारी ने सफाई में मदद की इन प्रयासों से आज कुसुम सरोवर व्यवस्थित रूप से मौजूद है कुसुम सरोवर की विशेषता चारों ओर बना पक्का घाट है जहां सुबह की धुन में सूर्य की किरणें पानी से सुनहरी लाली बिखेरती है घाट के किनारे के छोटे-छोटे मंदिर हैं जिनमें राधा कृष्ण और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित है कुसुम सरोवर में जाने का समय सुबह 5:00 से दोपहर 12:00 तक का और फिर शाम 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक का है सर्दियों में खुलने का समय बदलता है सुबह 5:30 से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 3:00 बजे से रात 8:00 बजे तक कुसुम सरोवर में प्रवेश मुक्त है लेकिन दान पेटी में योगदान कर सकते हैं मोबाइल और कैमरा अंदर ले जाना प्रतिबंधित है कुसुम सरोवर का इतिहास प्रकृति और भक्ति का अद्भुत संगम है यहां आने वाला है यात्री अपने भीतर नहीं ऊर्जा और शांति का अनुभवकरता है

5. गोवर्धन पहाड़ी
गोवर्धन पहाड़ी मथुरा के वृंदावन से लगभग 22 किलोमीटर दूर स्थित है एक पवित्र स्थल है यह भगवान श्री कृष्ण की लीला से सबसे अधिक जुड़ी हुई है क्योंकि कहा जाता है कि उन्होंने अपनी छोटी उंगली से इस पूरे पहाड़ को उठाकर ग्वालो की रक्षा की थी इस घटना को गोवर्धन उठाना कहा जाता है और यह भागवत पुराण में विस्तार से वर्णित है इसके इतिहास की बात करें तो इस स्थान का उल्लेख महाभारत और पुराणों में मिलता है प्राचीन काल में यहां कई छोटे-छोटे मंदिर और आश्रम थे लेकिन समय के साथ वह क्षीण हो गए 16वीं शताब्दी में राजा मानसिंह ने इस स्थल को पुन स्थापित किया और एक बड़ा पत्थर का मंडप बनवाया फिर 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारी जॉन स्मिथ ने यहां की साफ सफाई में मदद की और एक छोटा जलाशय बनवाया आज गोवर्धन पहाड़ी पर कई प्रमुख आकर्षण है मुख्य रूप से गोवर्धन मंदिर है जहां कृष्ण की मूर्ति स्थापित है इसके अलावा मनोकामना मंदिर जैविक उद्यान और पानी का कुंडली देखने को मिलता है पहाड़ी के चारों ओर सुंदर बगीचे और पगडंडिया हैं जहां लोग शहर सपाटे और योग का भी आनंद लेते हैं यह जाने का समय गर्मियों में सुबह 5:00 से दोपहर 12:00 तक और फिर शाम 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक रहता है सर्दियों में समय थोड़ा बदल जाता है सुबह 5:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 3:00 बजे से रात 8:00 तक विशेष अवसर जैसे गोवर्धन पूजा और दीपावली पर यहां विशेष आरती और कीर्तन होते हैं इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं पहाड़ी पर प्रवेश मुक्त है मोबाइल और कैमरा ले जाना प्रतिबंधित नहीं है परंतु शांति बनाए रखने के लिए ध्वनि प्रसार उपकरण बंद रखने की सलाह दी जाती है कुल मिलाकर गोवर्धन पहाड़ी इतिहास प्रकृति और भक्ति का अद्भुत संगम है जहां सभी यात्री को शांति और आनंद का अनुभव होता है

6. राधा कुंड
राधा कुंड वृंदावन के मध्य में स्थित एक छोटा लेकिन अत्यंत पवित्र जलाशय है कहा जाता है कि राधा जी ने यहां अपने आंसू से इस कुंड को भर दिया था इसलिए इसे राधा कुंड कहा जाता है इस स्थान का उल्लेख प्राचीन पौराणिक ग में मिलता है जहां इस प्रेम और भक्ति का प्रतीक बताया गया है इस कुंड का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है माना जाता है कि द्वापर युग में राधा और कृष्णा यहां कई बार मिलकर लीला की थी बाद में 16वीं शताब्दी में राजा मानसिंह ने इस स्थल को पुनर्वस्थित किया और चारों ओर पत्थर की घाट बनवाई 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारी ने से कुंड की साफ सफाई में सहयोग दिया जिससे आज भी इसका जल साफ और शुद्ध रहता है राधा कुंड के चारों ओर कई छोटे-छोटे मंदिर हैं जिनमें राधा जी और कृष्ण की मूर्तियां स्थापित हैं घाट पर सुबह की धुंध में सूर्य की किरणें जल पर सुनहरी लाली बिखेरती है जिससे मन को शांति मिलती है यहां का वातावरण भक्तों के भजन और कीर्तन से गूंजता है यहां पर जाने का समय गर्मियों में 5:00 से 12:00 बजे तक और फिर 4:00 बजे से 9:30 तक रहता है सर्दियों में उसमें थोड़ा बदल जाता है 5:30 बजे से 12:00 बजे तक और शाम 3:00 से 8:30 तक विशेष अवसर जैसे राधा रास्ते राधा जन्माष्टमी और दीपावली पर या विशेष आरती और कीर्तन होते हैं जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं कुंड में प्रवेश मुफ्त है लेकिन दान पेटी में योगदान किया जा सकता है मोबाइल और कैमरा अंदर ले जाना प्रतिबंधित है इसलिए श्रद्धालु केवल अपनी आंखों से इस पर इस दृश्य को देख पाते हैं राधा कुंड न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि प्रेम और भक्त का जीवन प्रत्येक भी है जहां हर आगमन पर मन में नई ऊर्जा का संचार होता है

7. गीता मंदिर (बिरला मंदिर)
गीता मंदिर मथुरा के केंद्र में स्थित एक सुंदर धार्मिक स्थल है या मंदिर भगवान कृष्ण के उपदेशों को समर्पित है और हर साल हजारों भक्तों को आकर्षित करता है इतिहास की बात करें तो इस मंदिर की नई 1970 के दशक में रखी गई थी और निर्माण कर 1982 में पूरा हुआ बिड़ला समूह ने इस परियोजना को वित्त पोषित किया इसलिए इसे अक्सर बिरला मंदिर कहा जाता है मंदिर का डिजाइन प्राचीन उत्तर भारतीय वास्तु कला से प्रेरित है जिसमें सफेद संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है मुख्य शिखर लगभग 70 फीट ऊंचा है और ओपन काशी में गीता के प्रमुख श्लोक अंकित हैं मंदिर परिसर में एक विशाल प्रांगण कई छोटे-छोटे शिकार और एक जलाशय है जहां श्रद्धालु स्नान कर सकते हैं अंदर स्थित मुख्य मूर्ति कृष्ण जी की है जो गीता का उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं इस मुहूर्त के पीछे गीता के 18 अध्यायों की पंक्तियां पत्थर पर लिखी गई है जिससे भक्त आसानी से पढ़ सकते हैं इस मंदिर में दर्शन का समय गर्मियों में सुबह 5:00 से दोपहर 12:00 तक और शाम 4:00 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है सर्दियों में समय इसका थोड़ा बदल जाता है सुबह 5:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे और शाम 3:00 से रात 8:30 तक विशेष अवसर गीता जयंती दीपावली और विशेष आरती और प्रवचन आयोजित होते हैं मंदिर में प्रवेश मुक्त है मोबाइल और कैमरा अंदर ले जाना प्रतिबंधित है इसलिए शांति बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है कुल मिलाकर गीता मंदिर न केवल एक पूजा स्थल है बल्कि संस्कृति इतिहास और शिल्प कला का जीवन उदाहरण है जहां हर आगमन पर मां को शांति और ज्ञान की अनुभूति होती है यहां के प्रांगण में बैठकर लोग गीता के श्लोक का पाठ करते हैं और मां को शुद्ध करते हैं इस स्थान की ऊर्जा हर यात्री को प्रेरित करती रहती है

8. कांस किला (मथुरा का प्राचीन किला)
कांस किला मथुरा के मध्य में स्थित एक ऐतिहासिक किला है जिसका नाम कंस राजा से जुड़ा माना जाता है कहा जाता है कि इस किले का निर्माण 10वीं 11वीं शताब्दी में हुआ था जब कंस राजवंश ने मथुरा पर शासन किया उसे समय कंस किला शहर की सुरक्षा के मुख्य केंद्र के रूप में कार्यकर्ता था बाद में मुगल काल में इस किले की कुछ हिस्से तोड़ फोड़ उठे परंतु 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे संरक्षित करने के लिए कुछ पुनर्स्थापना कार्य करवाए आज या किला इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों दोनों के लिए एक लोकप्रिय स्थल बन गया है कांच किले की वास्तुकला में हिंदू मुगल मिश्रण स्पष्ट रूप से दिखता है मुख्य प्रवेश द्वार पर बड़े पत्थर के खंभे और नक्काशीदार दरवाजा है जबकि अंदर के हिस्से में पुराने किलाबंदी की दीवारें बुर्ज और खाई देखी जा सकते हैं किले के भीतर एक छोटा मंदिर भी है जहां स्थानीय लोग पूजा पाठ करते हैं किले के ऊंचे स्थान से यमुना नदी और मथुरा शहर का सुंदर दृश्य दिखाई देता है जिससे यहां का सुबह और शाम का समय और भी आकर्षण बन जाता है गर्मियों में अकेला सुबह 5:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक खुला रहता है फिर शाम 4:00 बजे से रात 9:30 तक और सर्दियों में अकेला थोड़ा देर से खुलता है सुबह 5:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 3:00 बजे से रात 8:30 तक विशेष अवसर जैसे कांच किला महोत्सव स्वतंत्रता दिवस और गणेश चतुर्थी पर यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं जिसमें लोक नृत्य और संगीत का आयोजन किया जाता है प्रवेश मुक्त है परंतु दान पेटी रखी गई है मोबाइल और कैमरा ले जाना प्रतिबंधित नहीं है लेकिन शांति बनाए रखना आवश्यक है बल्कि मथुरा की समृद्ध इतिहास और संस्कृत का जीवन प्रत्येक भी है यहां आने वाले हर यात्री इतिहास की गहराई और आज की शांति का अनूठा मिश्रण महसूस करता है

9. मथुरा संग्रहालय
मथुरा संग्रहालय जिसे सरकारी संग्रहालय भी कहा जाता है मथुरा शहर के केंद्र में स्थित एक प्रमुख संस्कृत संस्थान है इसका निर्माण 1910 में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा शुरू हुआ और 1915 में जनता के लिए खोल दिया गया प्रारंभ में या केवल एक छोटा प्रदर्शनी हाल था परंतु समय के साथ इसमें कई विस्तार कार्य हुए और आज एक विशाल भवन में स्थित है संग्रहालय की मुख्य इमारत लाल बलुआ पत्थर से बनी है और इसमें दो बड़े प्रदर्शनी हाल एक पुस्तकालय और एक शोध विभाग शामिल है बाहर की दीवारों पर प्राचीन शिल्पों की प्रतिकृतियां लगाई गई है जो दर्शकों को इतिहास की ओर आकर्षित करती है संग्रहालय में रखी गई वस्तुएं मुख्यता कुषाण गुप्त और मध्ययुगीन काल की हैं यहां आपको पत्थर की मूर्तियां कांस्य के बर्तन प्राचीन सिक्के टेराकोटा के टुकड़े और कई हस्तलिखित ग्रंथ मिलेंगे विशेष रूप से प्रसिद्ध बोधिसत्व मूर्ति और त्रिवेणी शिल्प को देखना एक अद्भुत अनुभव है यदि आप संग्रहालय में जाकर इसे देखना चाहते हैं तो जाने का समय 10:00 से 5:00 तक का है और यह संग्रहालय हर सोमवार और राष्ट्रीय अवकाशों पर बंद रहता है प्रवेश शुल्क सामान्य जनता के लिए ₹20 छात्र के लिए ₹10 और वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ़्त है संग्रहालय में मोबाइल फोन और कैमरा की अनुमति नहीं है इसलिए सभी को शांति बनाए रखनी चाहिए यहां पर एक छोटा कैसे भी है जहां आप चाय और नाश्ता का आनंद ले सकते हैं मथुरा संग्रहालय न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए बल्कि आम पर्यटकों के लिए भी एक ज्ञानवर्धक स्थल है जहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्राचीन भारत की गौरवपूर्ण कहानी का अनुभव होता है

10. लठमार होली
बरसाना राधा की नगरी और नंद गांव श्री कृष्ण की नगरी में हर साल फाल्गुन के अंतिम सप्ताह में लठमार होली का अनोखा जश्न मनाया जाता है इस उत्सव की जेड द्वापर युग की एक प्राचीन कथा में है जब युवा श्री कृष्ण ने बरसाना की गोपियों को रंग लगाने की कोशिश की और उन्होंने लाठी से उनका पीछा किया तभी से महिलाएं छड़ी से पुरुषों को हल्का-फुल्का मरती हैं जबकि पुरुष ढाल लेकर बचते बचाते रंग लगाते है कहा जाता है कि इसका इतिहास जो है इस प्रकार है लट्ठ मार होली केवल रंग बिरंगी खुशी नहीं बल्कि राधा कृष्ण के प्रेम और सामाजिक समानता का प्रतीक है इस दिन महिलाएं अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं जबकि पुरुष हंसी मजाक के साथ इसे स्वीकार करते हैं यह परंपरा शताब्दियों से चली आ रही है और आज भी ग्रामीण वातावरण में जीवंत का संचार करती हैं इसका जो रिवाज और कार्यक्रम है इस प्रकार है कि पहले दिन बरसाना में महिलाएं लट्ठ लेकर नंदगांव के पुरुषों को मारती हैं जबकि पुरुष बसे बचाते रंग लगाते हैं रंग पाने के बीच गीत भजन और मनोरंजन का आनंद लिया जाता है अगले दिन नंद गांव की महिलाएं बरसाना आती हैं और वहीं खेल दोहराते हैं जिससे दोनों गांव के बीच प्रेम और मित्रता की भावना और गहरी होती है बरसाना में लठमार होली की शुरुआत शाम 4:30 बजे से होती है और देर रात तक चलती है यहां पर जो पर्यटक आते हैं वह सफेद कपड़े पहन कर आते हैं क्योंकि रंग बहुत तेजी से लगते हैं भीड़ के कारण पानी की बोतल और कुछ नाश्ता जरूर साथ में रखें मथुरा जंक्शन से बरसाना लगभग 42 किलोमीटर और नंद गांव लगभग 12 किलोमीटर तक बस है टैक्सी से आसानी से पहुंचा जा सकता है लठमार होली का अनुभव रंगों की बौछार लठ की थकान और हंसी खुशी से भरपूर एक अविस्मरणीय यात्रा जो हर आगंतुक के दिल में अमर यादें छोड़ जाता है

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